डिजिटल युग में संताली भाषा की नई उड़ान: अब ‘तोरजोमा’ सॉफ्टवेयर मिटाएगा भाषाओं की दूरी

जमशेदपुर | 25 जनवरी, 2026

​संताली संस्कृति और पहचान का प्रतीक ‘ओल चिकि’ लिपि अब केवल कागजों और शिलापट्टों तक सीमित नहीं रहेगी। तकनीक के इस दौर में संताली भाषा को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। एनआईटी (NIT) जमशेदपुर के विशेषज्ञों द्वारा विकसित किया जा रहा ‘तोरजोमा’ सॉफ्टवेयर अब ओल चिकि लिपि का हिंदी, अंग्रेजी और अन्य जनजातीय भाषाओं में डिजिटल अनुवाद करेगा।

​क्या है ‘तोरजोमा’?

​संताली भाषा में ‘तोरजोमा’ का अर्थ होता है— अनुवाद। यह एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो ओल चिकि लिपि और अन्य भाषाओं के बीच के भाषाई अंतर को खत्म करने का काम करेगा।

​पंडित रघुनाथ मुर्मू की विरासत को डिजिटल मजबूती

​ओल चिकि लिपि का आविष्कार 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा किया गया था। 30 अक्षरों वाली यह वैज्ञानिक लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती है। दशकों से डिजिटल संसाधनों की कमी के कारण इस लिपि में मौजूद समृद्ध ज्ञान और साहित्य को दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुँचाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। लेकिन ‘तोरजोमा’ इस बाधा को जड़ से मिटाने के लिए तैयार है।

​एनआईटी जमशेदपुर की टीम कर रही है कमाल

​इस महत्वाकांक्षी परियोजना का नेतृत्व एनआईटी जमशेदपुर के कंप्यूटर साइंस विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कौशलेंद्र कुमार सिंह कर रहे हैं। झारखंड सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा प्रायोजित इस प्रोजेक्ट में विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम जुटी हुई है:

  • डॉ. कौशलेंद्र कुमार सिंह (परियोजना प्रमुख)
  • आनंद कुमार ओम (पीएचडी स्कॉलर)
  • दुर्गा सोरेन (प्रोजेक्ट एसोसिएट)
  • हिमांशु कुमार पाठक व उन्नति चौरसिया (इंटर्न)

​’एसएएन-टीएमवीआई’ डेटाबेस: एक डिजिटल लाइब्रेरी

​डॉ. कौशलेंद्र ने बताया कि संताली जैसी जनजातीय भाषाओं को ‘कम संसाधन वाली भाषा’ माना जाता है, क्योंकि इंटरनेट पर इनका डेटा बहुत कम है। टीम ने इसके लिए ‘एसएएन-टीएमवीआई’ (SAN-TMVI) नामक एक विशेष डेटाबेस तैयार किया है।

​”वर्तमान में सॉफ्टवेयर के जरिए अंग्रेजी अनुवाद पर काम हो रहा है। हमारा लक्ष्य 2026 के अंत तक इसे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए पूरी तरह तैयार कर सार्वजनिक करना है।” – डॉ. कौशलेंद्र कुमार सिंह

 

​क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

  1. सांस्कृतिक संरक्षण: लुप्त होती जनजातीय लिपियों और बोलियों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा सकेगा।
  2. वैश्विक पहुँच: दुनिया भर के शोधकर्ता और लोग संताली साहित्य और संस्कृति को अपनी भाषा में समझ पाएंगे।
  3. शिक्षा में सुधार: नई पीढ़ी के लिए अपनी मातृभाषा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सीखना आसान होगा।

​’तोरजोमा’ सॉफ्टवेयर केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता को आधुनिकता के साथ जोड़ने वाला एक डिजिटल सेतु है। उम्मीद है कि यह आने वाले समय में झारखंड की अन्य भाषाओं के लिए भी एक मार्गदर्शक बनेगा।

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Author: haqeeqatnaama

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