हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है, ताकि बढ़ती आबादी से जुड़ी चुनौतियों और उनके समाधान के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाई जा सके। भारत जैसे विशाल देश के लिए जनसंख्या वृद्धि आज भी एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बनी हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर बढ़ता दबाव इसी का परिणाम है।
देश में पिछले कई दशकों से रोजगार सृजन और विकास की अनेक योजनाएं लागू की गईं, लेकिन तेज़ी से बढ़ती आबादी के कारण इनका अपेक्षित लाभ सभी तक नहीं पहुंच पाया। आबादी और संसाधनों के बीच बढ़ता असंतुलन गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक विषमताओं को और गहरा कर रहा है।
आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग गरीबी में जीवनयापन कर रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में अक्सर यह धारणा रहती है कि अधिक बच्चे भविष्य में अधिक कमाने वाले हाथ साबित होंगे। लेकिन बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत के दौर में बड़ा परिवार आर्थिक बोझ बन जाता है। ऐसे में परिवार नियोजन और छोटे परिवार के लाभों के प्रति जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से गरीब और अशिक्षित वर्ग की भागीदारी के बिना जनसंख्या स्थिरीकरण का लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।
जनसंख्या नियंत्रण को लेकर समय-समय पर कड़े कानून बनाने की मांग उठती रही है। कुछ राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को सरकारी नौकरी या स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से वंचित करने जैसे प्रस्ताव भी सामने आए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कदम न तो पूरी तरह व्यावहारिक हैं और न ही संवैधानिक दृष्टि से सर्वमान्य।
चीन का उदाहरण इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वहां 1980 में लागू की गई ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ के तहत केवल एक बच्चे की अनुमति थी। इस नीति के कारण जन्म दर में भारी गिरावट आई, लेकिन समय के साथ बुजुर्ग आबादी बढ़ने लगी और कामकाजी युवाओं की संख्या घटने लगी। परिणामस्वरूप चीन को पहले दो और बाद में तीन बच्चों की अनुमति देने के लिए अपनी नीति बदलनी पड़ी।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी देश की जनसंख्या को संतुलित बनाए रखने के लिए कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) लगभग 2.1 होनी चाहिए। चीन में यह दर लगातार गिरकर 1.3 तक पहुंच गई, जिससे वहां जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो गया।
भारत में भी स्थिति तेजी से बदल रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार 1990 के दशक में जहां महिलाओं की कुल प्रजनन दर लगभग 3.4 थी, वहीं यह घटकर लगभग 2.0 के आसपास पहुंच चुकी है। अनुमान है कि आने वाले दशकों में भारत की जनसंख्या वृद्धि धीमी होगी और फिर स्थिरता की ओर बढ़ेगी। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानूनों के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और जनजागरूकता पर अधिक जोर देना चाहिए।
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जिन राज्यों में साक्षरता दर अधिक है, वहां बिना किसी कठोर कानून के भी जनसंख्या वृद्धि दर में उल्लेखनीय कमी आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार गरीब और अशिक्षित महिलाओं में प्रजनन दर अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न महिलाओं में यह काफी कम है। इससे स्पष्ट होता है कि जनसंख्या वृद्धि का सीधा संबंध शिक्षा, आर्थिक स्थिति और सामाजिक जागरूकता से है।
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह संदेश देता है कि जनसंख्या नियंत्रण केवल सरकारी कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज में शिक्षा का प्रसार, महिलाओं का सशक्तिकरण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और परिवार नियोजन के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना सबसे अधिक जरूरी है। संतुलित जनसंख्या ही सतत विकास, बेहतर जीवन स्तर और समृद्ध भारत की आधारशिला बन सकती है।